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राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र, दिल्ली, राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् (रा.वि.सं.प.) द्वारा स्थापित चौथा विज्ञान केंद्र है। इससे पूर्व कोलकाता, बेंगलुरु और मुंबई में विज्ञान केंद्र स्थापित किए जा चुके थे। इस भवन की विशिष्ट रूपरेखा प्रसिद्ध वास्तुकार श्री ए. पी. कंविंदे द्वारा तैयार की गई थी, जिन्होंने इसे एक इंटरैक्टिव विज्ञान केंद्र की विशेष आवश्यकताओं के अनुरूप डिजाइन किया। डॉ. सरोज घोष, महानिदेशक, रा.वि.सं.प. तथा अन्य निदेशकों ने इसके डिजाइन और विकास प्रक्रिया में गहन विचार-विमर्श किया, जिससे यह केंद्र सभी के लिए एक अद्वितीय “सपनों का महल” बन सका।
इससे पहले, वर्ष 1979-1980 में नई दिल्ली नगर पालिका परिषद् (न.दि.न.प.) ने रा.वि.सं.प. को राष्ट्रीय राजधानी में विज्ञान केंद्र स्थापित करने हेतु आमंत्रित किया। प्रारंभ में विनय मार्ग स्थित नेहरू पार्क के निकट स्थान प्रस्तावित किया गया, किंतु पर्यावरणीय कारणों से तिमारपुर, खैबर पास संस्थागत क्षेत्र में एक भूखंड आवंटित की गई, जहाँ एक छोटा पार्क एवं कार्यालय भवन स्थापित किया गया। हालांकि, पीएमओके निर्देशानुसार,ट्रेड फेयर अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया द्वारा प्रगति मैदान में एक केंद्रीय स्थान पर स्थित भूखंड आवंटित किया गया, जहाँ वर्तमान भवन का निर्माण हुआ।
इसके साथ ही, राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र ने अपनी गतिविधियों का शुभारंभ नासा एवं जे.पी.एल. के सहयोग से विज्ञान भवन में आयोजित भव्य “स्पेस एंड मैनकाइंड” प्रदर्शनी से किया, जिसका उद्घाटन भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा किया गया। इसके अतिरिक्त, देशभर के विद्यालयी छात्रों में वैज्ञानिक चेतना एवं नवाचार की भावना को प्रोत्साहित करने हेतु “राष्ट्रीय विज्ञान संगोष्ठी” सहित अनेक महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ प्रारंभ की गईं। विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के विजेता छात्र-छात्राओं एवं युवा प्रतिभागियों को प्रधानमंत्री निवास पर आमंत्रित कर उनसे संवाद भी कराया गया, जो उनके लिए अत्यंत प्रेरणादायी एवं गौरवपूर्ण अनुभव रहा।
राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र, दिल्ली को “एनर्जी इन लाइफ” प्रदर्शनी के संचालन का महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया, जिसे राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान द्वारा विकसित कर प्रगति मैदान में प्रदर्शित किया गया। इस प्रदर्शनी ने वहाँ केंद्र की प्रभावशाली एवं विशिष्ट उपस्थिति स्थापित की। विज्ञान को उत्तरी भारत के दूरस्थ एवं ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचाने के उद्देश्य से मोबाइल विज्ञान प्रदर्शनी कार्यक्रमों का शुभारंभ किया गया। इसके अतिरिक्त, दिल्ली विज्ञान केंद्र के सक्रिय योगदान से अमेरिका में प्रतिष्ठित “फेस्टिवल ऑफ इंडिया – साइंस एग्ज़िबिशन” का सफल एवं गौरवपूर्ण आयोजन किया गया।इसके साथ ही, नासा एवं जे.पी.एल. के वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों की सहभागिता से “स्पेस फोटोग्राफी” प्रदर्शनी का आयोजन भी किया गया।आगामी विज्ञान केंद्र भवन में सी.आई.एम.यू.एस.ई.टी. में एक अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय सम्मेलन का उद्घाटन किया गया।पहली बार दिसंबर, 1988 मेंराष्ट्रीय विज्ञान केंद्र में “फन साइंस” दीर्घा स्थापित की गई। केंद्र के लिए "सूचना क्रांति" दीर्घा मेंएक अभिनव “वॉक-थ्रू प्रदर्श” अवधारणा विकसित की गई,जिसे बाद में ‘सोसायटीफॉरदीहिस्ट्रीऑफटेक्नोलॉजी’द्वारा प्रतिष्ठित “डिबनरपुरस्कार” से सम्मानित किया गया। केंद्र द्वारा समय-समय पर अनेक आकर्षक एवं इंटरैक्टिव प्रदर्शों तथा कार्यक्रमों की स्थापना की गई, जिनमें एनर्जी बॉल शो, विरासत दीर्घा, इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज़, प्रागैतिहासिक रोबोटिक प्रदर्श तथा ‘हैंड्स-ऑन’ प्रदर्श विशेष रूप से लोकप्रिय एवं आकर्षण का केंद्र बने।
इस केंद्र का उद्घाटन 9 जनवरी, 1992 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री पी. वी. नरसिंह राव द्वारा, केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. अर्जुन सिंह तथा अनेक गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति में राष्ट्र को समर्पित करते हुए किया गया। इस प्रकार, राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र राष्ट्रीय राजधानी में एक उत्कृष्ट विज्ञान संचार केंद्र की स्थापना के लिए राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालयपरिषद् (रा.वि.सं.प.) की दूरदर्शी सोच एवं सतत प्रयासों का सफल प्रतिफल बनकर उभरा, जिसने उत्तर क्षेत्रीय मुख्यालय के रूप में भी अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की।रणनीतिक रूप से निरंतर विकसित होते हुए, यह केंद्र आज एशिया के अग्रणी एवं प्रतिष्ठित विज्ञान केंद्रों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुका है। इंटरैक्टिव प्रदर्शों, नवाचारी शैक्षिक गतिविधियों तथा व्यापक जन-जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से यह केंद्र समाज में वैज्ञानिक चेतना, ज्ञान एवं नवाचार की भावना को प्रोत्साहित कर रहा है। विज्ञान को रोचक, अनुभवात्मक एवं सर्वसुलभ बनाने की अपनी प्रतिबद्धता के कारण यह केंद्र अपनी लोकप्रिय पहचान “सभी के लिए सपनों का महल” को पूर्णतः सार्थक सिद्ध कर रहा है।